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Mool Vidhi Part-3


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भारतीय दंड संहिता की धारा 121 में
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भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना यायुद्ध करने का दुष्प्रेरण करना मृत्युदंड से या आजीवन कारावास से और जुर्माने से भी दंडनीय है।

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Mool Vidhi Part-3 - Details

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भारतीय दंड संहिता की धारा 121 में
भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना यायुद्ध करने का दुष्प्रेरण करना मृत्युदंड से या आजीवन कारावास से और जुर्माने से भी दंडनीय है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 120-ए के अनुसार ,
जब दो या दो से अधिक व्यक्ति कोई अवैध कार्य अथवा कोई ऐसा कार्य जो अवैध नहीं है, अवैध संसाधनों द्वारा करने या करवाने को सहमत होते हैं, अब ऐसी सहमति आपराधिक षड्यंत्र कहलाती है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B में
आपराधिक षड्यंत्र के लिए दंड का प्रावधान दिया गया है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 120-A में
आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा दी गई है।
जयदेव बनाम स्टेट वाद का संबंध
आत्मरक्षा के अधिकार से है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 96 से 106 तक में
व्यक्ति के शरीर तथा संपत्ति संबंधी प्रतिरक्षा के अधिकारों का वर्णन किया गया है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 94 के
अंतर्गत हत्या और मृत्यु से दंडनीय अपराध को छोड़कर वह कार्य जिसको कोई व्यक्ति मृत्यु की तुरंत धमकी द्वारा विवश किए जाने के फलस्वरुप करता है, अपराध नहीं होगा।
भारतीय दंड संहिता की धारा 85 में
अनैच्छिक (अपनी इच्छा के विरुद्ध ) मत्तता के आधार पर आपराधिक दायित्व से प्रतिरक्षा का प्रावधान करती है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 84 के अंतर्गत
विकृत चित्त व्यक्ति के कार्य को अपराध नहीं माना जाता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 83 के अंतर्गत
7 वर्ष के ऊपर किंतु 12 वर्ष से कम आयु की अपरिपक्व समझ के शिशु को आपराधिक दायित्व से उन्मुक्त प्राप्त है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 82 के अंतर्गत
कोई बात अपराध नहीं है जो 7 वर्ष से कम आयु के शिशु द्वारा की जाती है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 80 में वर्णित है कि
कोई बात अपराध नहीं है जो दुर्घटना से घटित होता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 78 के अंतर्गत
न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य अपराध नहीं है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 73 के अनुसार
अभियुक्त को एकांत परिरोध में रखने की अधिकतम अवधि 3 माह की है।
भारतीय दंड संहिता की धाराएं 121, 132, 194, 302, 305, 307, 364-क और 396 में
मृत्युदंड दिए जाने का प्रावधान है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 96 से 106 तक की धाराएं
न्यायोचित प्रतिरक्षा से संबंधित हैं।
भारतीय दंड संहिता की धारा 76 से 95 तक की धाराएं
क्षमा योग्य बचाओ से संबंधित हैं।
भारतीय दंड संहिता की धारा 54 के अनुसार,
यदि किसी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा मृत्युदंड दिया जाता है तो यदि समुचित सरकार उचित समझे तो वह मृत्युदंड को कम कर सकती है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 57 के अंतर्गत
आजीवन कारावास को 20 वर्ष के कारावास के तुल्य गिना जाएगा।
भारतीय दंड संहिता की धारा 53 में निम्न प्रकार के दंड बताए गए हैं : -
मृत्युदंड, आजीवन कारावास, कारावास (कठोर श्रम के साथ कारावास तथा सादा कारावास ) , संपत्ति का समपहरण, जुर्माना
भारतीय दंड संहिता की धारा 42 के अनुसार -
स्थानीय विधि वह विधि है जो भारत के किसी विशिष्ट भाग में लागू हो।
भारतीय दंड संहिता की धारा 41 के अनुसार -
विशेष विधि वह विधि है जो किसी विशिष्ट विषय पर लागू हो।
भारतीय दंड संहिता की धारा 4 के अनुसार -
भारत के बाहर किसी भी स्थान पर भारतीय नागरिक द्वारा या भारत में पंजीकृत किसी पोत या विमान पर, वह चाहे जहां भी हो, किसी व्यक्ति द्वारा इस संहिता के अंतर्गत अपराध किए जाने पर इस संहिता के उपबंध लागू होंगे।
भारतीय दंड संहिता की धारा 2 के अनुसार -
जो व्यक्ति भारत के राज्य क्षेत्र के अंतर्गत अपराध करता है वह इस संहिता द्वारा दंडित किया जाएगा।
भारतीय दंड संहिता की धारा 1 संबंधित है -
संहिता के नाम और उसके परिवर्तन के विस्तार से